इतिहास: मेवाड़ का गुहिल वंश (भाग-1)
मेवाड़ का इतिहास केवल राजाओं की गाथा नहीं है, यह त्याग और बलिदान की पराकाष्ठा है। चलिए इसे व्यवस्थित तरीके से समझते हैं।
1. गुहिल वंश: एक परिचय
- संस्थापक: गुहिल (566 ईस्वी में स्थापना)।
- प्रकृति: ये सूर्यवंशी हिन्दू थे।
- शाखाएँ: गुहिल वंश की कुल 24 शाखाएँ थीं।
🔍 उत्पत्ति के विभिन्न मत (विद्वानों के अनुसार)
परीक्षा में अक्सर मिलान करने वाले प्रश्न यहाँ से आते हैं, इसे इस टेबल से समझें:
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विद्वान |
गुहिलों की उत्पत्ति का स्रोत |
|---|---|
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अबुल फजल |
ईरान के बादशाह 'नौशेखा' के वंशज |
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कर्नल जेम्स टॉड |
वल्लभी (गुजरात) के राजा शिलादित्य के पुत्र |
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डी.आर. भण्डारकर |
ब्राह्मण वंश (आनंदपुर से आगमन) |
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मुहणोत नैणसी/गोपीनाथ शर्मा |
ब्राह्मण वंशी मानते हैं |
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कुम्भलगढ़ प्रशस्ति |
इन्हें 'विप्र' (ब्राह्मण) बताती है |
2. महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत (सबूत)
इतिहास बिना प्रमाण के अधूरा है। गुहिल वंश की जानकारी हमें यहाँ से मिलती है:
-
सामोली अभिलेख (646 ई., उदयपुर): * यह गुहिल वंश की जानकारी देने वाला सबसे प्राचीनतम अभिलेख है।
- यह राजा 'शिलादित्य' (गुहिल का 5वां वंशज) के समय का है।
- विशेष: इसमें उदयपुर के 'जावर माता मंदिर' और उस समय के 'खनन उद्योग' (Mining) का उल्लेख मिलता है।
3. मेवाड़ के प्राचीन नाम (Geography of History)
मेवाड़ क्षेत्र को प्राचीन काल में इन नामों से जाना जाता था:
- मेदपाट 2. प्राग्वाट
- शिवि जनपद
4. बप्पा रावल / कालभोज (734 - 753 ईस्वी)
यह मेवाड़ के वास्तविक प्रतापी शासक थे। इन्हें 'मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक' कहना गलत नहीं होगा।
- वास्तविक नाम: कालभोज (जी.एच. ओझा के अनुसार)।
- गुरु: ये 'हारित ऋषि' के परम अनुयायी थे।
- चित्तौड़ विजय: 734 ई. में अपने गुरु के आशीर्वाद से मानमौर्य को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार किया। (स्रोत: राजप्रशस्ति)।
🏰 शासन और उपलब्धियां
- राजधानी: नागदा (उदयुपर)।
- धार्मिक योगदान: नागदा में एकलिंग जी का मंदिर बनवाया।
- Note: मेवाड़ के राजा स्वयं को एकलिंग जी का 'दीवान' मानते थे।
- आर्थिक सुधार: मेवाड़ में सबसे पहले सोने के सिक्के चलाए (115 ग्रेन का सिक्का)।
- सैन्य शक्ति: इन्होंने मुस्लिम सेना को हराते हुए गजनी (अफगानिस्तान) तक खदेड़ा और वहां के राजा सलीम को हटाकर अपने भांजे को राजा बनाया।
- उपाधियाँ: 1. हिन्दू सूरज 2. राजगुरु 3. चक्कवै (चारों दिशाओं को जीतने वाला)
🚩 शिक्षक की विशेष टिप: > इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना फ्रांसीसी सेनापति 'चार्ल्स मार्टेल' से की है। यह प्रश्न कई बार परीक्षाओं में रिपीट हुआ है!
1. अल्लट (उपनाम: आलू रावल) - 'मेवाड़ का आधुनिक निर्माता'
बप्पा रावल के बाद अल्लट ने मेवाड़ को एक नई पहचान दी।
- दूसरी राजधानी: उदयपुर के 'आहड़' को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
- धार्मिक कार्य: आहड़ में प्रसिद्ध 'वराह मंदिर' का निर्माण करवाया।
- अंतर्राष्ट्रीय विवाह: हूण राजकुमारी 'हरिया देवी' से विवाह किया (राजस्थान का पहला ज्ञात अंतर्राष्ट्रीय विवाह)।
- हरिया देवी ने 'हर्षपुर' नामक गाँव बसाया था।
- प्रशासनिक उपलब्धि: मेवाड़ में पहली बार 'नौकरशाही' (Bureaucracy) की स्थापना की।
अल्लट की कैबिनेट (नौकरशाही के पद):
- अमात्य: मुख्यमंत्री / प्रधानमंत्री।
- संधि विग्रहक: युद्ध और शांति का मंत्री (Foreign Minister)।
- अक्षपटलिक: आय-व्यय का अधिकारी (Accountant)।
- भिषगाधिराज: राजवैद्य (Chief Doctor)।
- वन्दीपति: राजा की प्रशंसा करने वाला (कवि/चारण)।
2. शक्ति कुमार (977 ईस्वी)
- इनके समय 'मुंज परमार' (मालवा) ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर उसे जीत लिया था।
- हस्तकुण्डी अभिलेख: इसी काल की जानकारी देता है।
3. जैत्रसिंह (1213 - 1253 ईस्वी) - 'मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल'
इतिहासकार दशरथ शर्मा ने इनके शासन को 'मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल' कहा है।
⚔️ भूताला का युद्ध (1227 ई.)
- किसके बीच: जैत्रसिंह vs इल्तुतमिश (दिल्ली सुल्तान)।
- परिणाम: जैत्रसिंह की शानदार जीत। इल्तुतमिश की भागती हुई सेना ने 'नागदा' को लूट लिया और तहस-नहस कर दिया।
- नई राजधानी: नागदा के नष्ट होने के कारण जैत्रसिंह ने चित्तौड़ को अपनी नई राजधानी बनाया।
- चित्तौड़ का सामरिक महत्व: यह किला अभेद्य था।
- भौगोलिक स्थिति: मालवा और गुजरात जाने वाले व्यापारिक मार्ग पर स्थित।
- खिलजी की साम्राज्यवादी नीति: पूरे भारत पर अधिकार करने की चाह।
- प्रतिष्ठा का प्रश्न: मेवाड़ की बढ़ती शक्ति दिल्ली के लिए चुनौती थी।
- कहाँ की थी: सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री।
- तोता: 'हीरामन' जाति का तोता (जो इंसानों जैसी बोली बोलता था) ने रतन सिंह को उनकी सुंदरता के बारे में बताया।
- साहित्यिक स्रोत: मलिक मोहम्मद जायसी की पुस्तक 'पद्मावत' (1540 ई.)। (ध्यान रहे: यह युद्ध के 240 साल बाद लिखी गई थी)।
- केसरिया (Khesariya): रावल रतन सिंह के नेतृत्व में। उनके सेनापति गोरा और बादल (चाचा-भतीजा) वीरता से लड़ते हुए शहीद हुए।
- जौहर (Jauhar): रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ अग्नि कुंड में आत्मदाह किया।
- तारीख: 26 अगस्त, 1303 को चित्तौड़ पर खिलजी का अधिकार हो गया।
- नाम परिवर्तन: अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर 'खिज्राबाद' रख दिया।
- कत्लेआम: खिलजी ने किले के अंदर 30,000 हिंदुओं के कत्लेआम का आदेश दिया था।
- अमीर खुसरो: वह इस युद्ध के दौरान खिलजी के साथ था। उसने अपनी पुस्तक 'खजाइन-उल-फुतूह' (तारीख-ए-इलाही) में इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन किया है।
- धायबी पीर की दरगाह: यहाँ के फारसी लेख में चित्तौड़ का नाम 'खिज्राबाद' मिलता है।
📚 शोधकर्ता की विशेष डायरी:
इस युद्ध की जानकारी जयसिंह सूरी की पुस्तक 'हम्मीर मद मर्दन' से मिलती है। यहाँ 'हम्मीर' शब्द इल्तुतमिश के लिए उपयोग हुआ है (मद मर्दन = घमंड तोड़ना)।
रावल रतन सिंह और पद्मिनी (1302 - 1303 ई.)
रावल रतन सिंह, 'रावल शाखा' के अंतिम शासक थे। इनके समय की सबसे बड़ी घटना चित्तौड़ का प्रथम साका है।
1. अलाउद्दीन खिलजी (AK) के आक्रमण के कारण
इतिहासकार केवल 'पद्मिनी की सुंदरता' को कारण मानते हैं, लेकिन एक 'शोधकर्ता' के नाते हमें ये 4 मुख्य कारण पता होने चाहिए:
2. रानी पद्मिनी: एक परिचय
3. चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)
जब घेराबंदी लंबी खिंची, तो राजपूतों ने 'साका' करने का निर्णय लिया।
साका = केसरिया + जौहर
4. युद्ध के बाद के महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Special)
हम्मीर देव सिसोदिया (1326 - 1364 ई.)
अलाउद्दीन खिलजी के बाद मेवाड़ अंधकार में था, जिसे राणा हम्मीर ने फिर से रोशन किया।
1. मेवाड़ का उद्धारक (Saviour of Mewar)
- वंश: ये सिसोदा गाँव के थे, इसलिए यहाँ से राजा 'सिसोदिया' कहलाए।
- उपाधि: इन्होंने 'रावल' के स्थान पर 'राणा' की उपाधि धारण की।
- पुनरुद्धार: 1326 ई. में बनवीर सोनगरा (मालदेव का पुत्र) को हराकर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया।
2. महत्वपूर्ण युद्ध: सिंगोली का युद्ध (बांसवाड़ा)
- किसके बीच: राणा हम्मीर vs मुहम्मद बिन तुगलक (MBT - दिल्ली सुल्तान)।
- परिणाम: हम्मीर की प्रचंड जीत। तुगलक को बंदी बना लिया गया था।
3. हम्मीर की प्रमुख उपाधियाँ (परीक्षा के लिए अति-महत्वपूर्ण)
इतिहास के विभिन्न स्रोतों में इन्हें इन नामों से नवाजा गया है:
- विषम घाटी पंचानन: (विकट परिस्थितियों में शेर के समान)।
- स्रोत: कुम्भलगढ़ प्रशस्ति।
- वीर राजा: * स्रोत: रसिक प्रिया (राणा कुम्भा द्वारा लिखित टीका)।
- मेवाड़ का उद्धारक: कर्नल टॉड ने इन्हें यह नाम दिया।
4. निर्माण कार्य
- अन्नपूर्णा माता का मंदिर: चित्तौड़गढ़ किले में अपनी इष्टदेवी का मंदिर बनवाया।
हम्मीर देव सिसोदिया (1326 - 1364 ई.)
अलाउद्दीन खिलजी के बाद मेवाड़ अंधकार में था, जिसे राणा हम्मीर ने फिर से रोशन किया।
1. मेवाड़ का उद्धारक (Saviour of Mewar)
- वंश: ये सिसोदा गाँव के थे, इसलिए यहाँ से राजा 'सिसोदिया' कहलाए।
- उपाधि: इन्होंने 'रावल' के स्थान पर 'राणा' की उपाधि धारण की।
- पुनरुद्धार: 1326 ई. में बनवीर सोनगरा (मालदेव का पुत्र) को हराकर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया।
2. महत्वपूर्ण युद्ध: सिंगोली का युद्ध (बांसवाड़ा)
- किसके बीच: राणा हम्मीर vs मुहम्मद बिन तुगलक (MBT - दिल्ली सुल्तान)।
- परिणाम: हम्मीर की प्रचंड जीत। तुगलक को बंदी बना लिया गया था।
3. हम्मीर की प्रमुख उपाधियाँ (परीक्षा के लिए अति-महत्वपूर्ण)
इतिहास के विभिन्न स्रोतों में इन्हें इन नामों से नवाजा गया है:
- विषम घाटी पंचानन: (विकट परिस्थितियों में शेर के समान)।
- स्रोत: कुम्भलगढ़ प्रशस्ति।
- वीर राजा: * स्रोत: रसिक प्रिया (राणा कुम्भा द्वारा लिखित टीका)।
- मेवाड़ का उद्धारक: कर्नल टॉड ने इन्हें यह नाम दिया।
4. निर्माण कार्य
- अन्नपूर्णा माता का मंदिर: चित्तौड़गढ़ किले में अपनी इष्टदेवी का मंदिर बनवाया।
💡 शोधकर्ता की विशेष 'Quick Table' (सिसोदिया वंश की नींव)
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पद/नाम |
विवरण |
|---|---|
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मूल स्थान |
सिसोदा गाँव (राजसमंद) |
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कुलदेवता |
एकलिंग जी (शिवजी) |
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कुलदेवी |
बाण माता |
|
इष्टदेवी |
अन्नपूर्णा (बरवड़ी) माता |
|
राजवाक्य |
"जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार" |
राणा लाखा और राणा मोकल
1. राणा लाखा (लक्ष सिंह) [1382 - 1421 ई.]
इन्हें 'भाग्यशाली शासक' कहा जा सकता है क्योंकि इनके समय में दो बड़ी घटनाएं हुईं:
- 🪙 जावर की खान (उदयपुर): इनके शासनकाल में जावर में चांदी और सीसा-जस्ता (Lead-Zinc) की खान निकली। इससे मेवाड़ की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो गई।
- 🚣 पिछोला झील का निर्माण: एक 'पिच्छू' नामक बंजारे ने अपने बैल की याद में उदयपुर में पिछोला झील बनवाई।
- विशेष: इसी झील के किनारे 'नटनी का चबूतरा' बना हुआ है।
💍 मारवाड़-मेवाड़ संबंध (हंसाबाई का विवाह)
- शर्त: मारवाड़ के राव चूड़ा की पुत्री हंसाबाई का विवाह लाखा से इस शर्त पर हुआ कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का अगला राजा बनेगा।
- भीष्म पितामह: लाखा के बड़े पुत्र कुँवर चूड़ा ने अपने पिता की खुशी के लिए राज्य का त्याग कर दिया। इसीलिए इन्हें 'मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है।
2. राणा मोकल [1421 - 1433 ई.]
हंसाबाई और लाखा के पुत्र। 12 वर्ष की अल्पायु में राजा बने।
- संरक्षक: शुरुआत में कुँवर चूड़ा संरक्षक थे, बाद में मारवाड़ के रणमल राठौड़ (हंसाबाई के भाई) संरक्षक बने।
-
निर्माण कार्य:
- चित्तौड़गढ़ में 'समिद्धेश्वर मंदिर' का जीर्णोद्धार कराया (इसे 'मोकल का मंदिर' भी कहते हैं)।
- एकलिंग जी मंदिर के चारों ओर परकोटा बनवाया।
- हत्या (1433 ई.): जिलवाड़ा (राजसमंद) के अभियान के दौरान चाचा और मेरा ने (महपा पंवार के साथ मिलकर) मोकल की हत्या कर दी।
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